न जाने कब मौत का पैगाम आ जाये

न जाने कब मौत का पैगाम आ जाये
न जाने कब जिन्दगी की आखरी शाम आ जाये
ढुनता हूँ एसा मौका दोस्तों की
मेरी जिन्दगी किसी के काम आ जाये
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गा तो हम भी लेते है गर वो आवाज होती
बजा तो हम लेते गर वो साज होती
क्या बस शाहजंह ही ताजमहल बना सकता है
अरे हम भी बना लेते गर सीने मैं कोई मुमताज होती
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काटे नहीं कटते लम्हे इंतजार के
नजरे बिछाए बैठे है रास्ते पे यार के
दिल ने जो देखे जलवे हुस्ने यार के
लाया है कौन इन्हें फलक से उतार कर
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